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पर्यावरण संताप | 2YODOINDIA POETRY | लेखिका श्रीमती प्रभा पांडेय जी | पुरनम | WRITTEN BY MRS PRABHA PANDEY JI

|| आंगन ||

आंगन

संध्या से ही बिछ जाती थीं खाटें घर के आंगन में,
तारों भरा आकाश देखने,कब लेटें रहता मन में ।

बहुत नहीं बीते होंगे बस चालीस से पचास बरस,
ग्रीष्म ऋतु की रातें रहती थीं तब थोड़ी अधिक सरस ।
बड़े बुजुर्गों द्वारा सुनते कथा,कहानी प्रहसन में,
संध्या से ही बिछ जाती थीं खाटें घर के आंगन में ।

ऊपर तारे नीचे जुगनू,कितने दृश्य सुहाने थे,
सभी पड़ोसी एक दूसरे से तब रिश्ता मानें थे,
टेर-टेर कर दुख-सुख पूछें,कितना सुख था जीवन में,
संध्या से ही बिछ जाती थीं खाटें घर के आंगन में ।

तुलसी की भीनी सी महक के संग थी जूही चमेली भी,
रात की रानी गमक फेंकती बन खुशबू की ढेली भी ।
नींद लगी तो भी रहती थी प्रकृति हर क्षण दर्शन में,
संध्या से ही बिछ जाती थीं खाटें घर के आंगन में ।

आज सभी सोते हैं कूलर और ए.सी.में टेस में,
घुसे रोग अस्थि पीड़ा व श्वास दमा के भेस में ।
ना करते व्यवहार पड़ोसी पहले से अपनापन में,
संध्या से ही बिछ जाती थीं खाटें घर के आंगन में ।

नहीं बचा कवि सृजन में अब वो पहले जैसा पैनापन,
नहीं मल्हार से नेह बरसता नहीं संगीत में वो बंधन ।
और
नहीं बची प्राकृतिक सुवास अब जीवन के अभिनन्दन में,
संध्या से ही बिछ जाती थीं खाटें घर के आंगन में ।

लेखिका
श्रीमती प्रभा पांडेय जी
” पुरनम “

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