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      || भाभी ||

      भाभी

      लगभग तीस साल पहले मेरे रिश्ते के मामा मेरे शहर जबलपुर में रहते थे। वे साधारण सी सरकारी नौकरी में थे, उनके चार बेटे, दो बेटियाँ थीं। मामी कम पढ़ी घरेलू सीधी-सादी महिला थी। मामा का बड़ा लड़का मुझसे दो साल बड़ा था। उसे मेरे साथ स्कूल भेजा जाता पर वह आधे रास्ते से मुझसे अलग हो जाता। टिफिन कहीं भी बैठकर खा लेता दिन भर यहाँ-वहाँ घूमता शाम को घर आ जाता। दूसरे शब्दों में कहा जाये तो उसका मन पढ़ाई-लिखाई में नहीं लगता था, फलस्वरूप वह आगे नहीं पढ़ पाया उसका नाम गोपाल था। उसके दूसरे भाई- बहन आठवीं, दसवीं कर गये, एक वही अनपढ़ रह गया।

      मामा को उत्तर प्रदेश के एक गाँव में अपने ननिहाल की जमीन जायजाद मिल जाने के कारण वह जबलपुर की नौकरी छोड़ यू.पी. चले गये । मामा-मामी दोनों कामचोर आलसी किस्म के थे। जमीन को दूसरे को बंटाई पर देने से जो आय होती उसे बैठे-बैठे खाते रहते। कम पड़ता तो जमीन का कोई टुकड़ा बेच देते। कुछ दिन तक तो शुद्ध घी के पकवान छनते फिर वही रुखी-सूखी पर उतर आते। दूसरे शब्दों में पति-पत्नि दोनों दूरदर्शी नहीं थे। आज पर उनका ध्यान केन्द्रित रहता, कल किसने देखा है ये सोचकर वे भविष्य को नजर अंदाज करते जाते। बड़ा गोपाल क्योकि पढ़ा लिखा भी नहीं था घर का ज्यादातर काम उसे करना पड़ता। आटा पिसाना, पानी भरना, कभी-कभी झाडू बुहारू तक उसे करना पड़ता, ऊपर से उसके छोटे भाई जब चाहे तब उसे धुनक देते।

      समय की गति कहाँ थमती है। जमीन बेच-बेचकर मामा ने लड़कियों का विवाह कर दिया। गोपाल के छोटे भाइयों का भी विवाह कर दिया गया। वे लोग भी छोटी-मोटी नौकरियों पर लग चुके थे। उन्हें लड़की मिलने में परेशानी नहीं गई। गोपाल की शादी के लिये ना उसके माता-पिता ने सोचा ना ही रिश्ते आये वह वहीं नौकरों जैसा घर का काम करता रहता। शरीर से भी कमजोर रह गया।

      सब बच्चों की शादी के बाद मामा को कुछ रिश्तेदारों ने कहा कि बुढ़ापे में गोपाल को कौन रोटी देगा, उसका भविष्य क्या है, कोई भी मामूली गरीब या अनाथ लड़की से उसका विवाह अवश्य करा दें सो उन्हें अपनी जिम्मेदारी का एहसास हुआ तो पास के गाँव की एक अपाहिज लड़की जो खड़ी भी नहीं हो सकती थी, बैठी ही बैठी चलती थी, से गोपाल का सादे रूप में विवाह कर दिया गया। अब सीधे-सादे गोपाल का भी घर बस गया। उसकी पत्नी शरीर से तो अपाहिज थी पर दिमाग की तेजस्विनी बुद्धिमति व मेहनती लड़की थी, नाम था पार्वती।

      उसे विकलांग सहायता केन्द्र से एक सिलाई मशीन व एक साइकिल रिक्शा जैसी गाड़ी, जिसमें विकलांग व्यक्ति एक स्थान से दूसरे स्थान पर आसानी से जा सकता था प्राप्त हो गया। वह उस साइकिल जैसी गाड़ी चलाकर लोगों के घरों से सिलाई के कपड़े ले आती। दिन भर में सी-टाँककर शाम तक वापिस पहुँचा आती जिसकी सिलाई आठ रुपये हो तो लोग उसे खुशी से दस दे देते अर्थात उसे बाजार रेट से कुछ अधिक ही प्राप्त होता था। घर में वह घिसट- घिसट झाडू बुहारू, खाना बनाना, कपड़े धोना सब काम बखूबी कर लेती थी व्यवहार कुशल ऐसी कि बड़ों को कदमों में सिर रख प्रणाम करती व छोटों को आशीर्वाद देने में कभी कंजूसी ना करती।

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      विवाह के आठ-दस साल में ही उसे चार बेटियाँ व एक बेटा हुआ। सो पार्वती के परिवार में पांच बच्चे और मंहगाई दमतोडू। पार्वती के देवर अपना- अपना परिवार लेकर अलग-अलग घरों में रहने लगे जो रही-सही जमीन थी भाइयों ने उसका बंटवारा कर लिया पार्वती के भाई भले ही गरीब थे पर बहन के परिवार का ध्यान रखते थे वे गोपाल (अपने जीजा) को मान-आदर भी देते थे क्योकि उसने उनकी अपाहिज बहन से शादी की थी।

      बंटवारे में एक घर जिसमें ये सब रहते थे मामा-मामी के हिस्से में आया। बाकी सबने अपने घर पहले से बना लिये थे। पार्वती के भाईयों ने भैंस की एक पड़िया दो तीन साल पहले पार्वती को दी थी, वह यहाँ वहाँ घास-फूस खाकर बढ़िया मुर्रा भैंस बन गई सो बारह हजार में वह भैंस बेचकर पार्वती व उसके पति ने जो जमीन का टुकड़ा उन्हें हिस्से में मिला था, उसमें एक कमरा बनाया। कुछ मदद पार्वती के भाइयों ने दी। मसलन दरवाजे, खिड़की, सीमेंट में उन्होंने भी मदद की।

      पुराने घर में मामा-मामी भर रह गये, वह घर भी जर्जर हाल में था। मामी से अब खाना नहीं बन पाता था क्योंकि वह बीमार व बूढ़ी हो गई थी। पार्वती के भाईयों ने एक कमरा अपनी बहन को इस गरज से बना दिया था कि मामा-मामी के बाद उनके जर्जर मकान का भी बंटवारा करने उनके दूसरे बेटे आ जायेंगे तो हमारी बहन कम से कम सिर छिपाने लायक स्थान की स्वामिनी तो बन जाये।

      पार्वती की दो बेटियों को उसके भाई अपने घर में रखकर पढ़ा-लिखा रहे थे दूसरे शब्दों में कहा जाये तो पार्वती के भाइयों का गरीब होने के बावजूद हार्दिक आधार गोपाल के परिवार को प्राप्त हो गया था। ऐसे कठिन समय में भी पार्वती अपने सास-ससुर का खाना बनाकर बच्चों के हाथ भेज देती क्योकि पढ़े लिखे संपन्न बेटों ने मामा-मामी से कन्नी काट ली थी।

      अपने एक कमरे को पार्वती ने लीप-पोत कर व सिलाई में बचे टुकडों को जोड़कर आकर्षक ढंग के पर्दे आदि लगाकर कुछ ऐसा बना दिया कि किसी चित्रकार की कला का अनुपम प्रतीक नजर आने लगा हालांकि जीवन का संघर्ष, तंगहाली, तनावपूर्ण घटनायें सब अपना रूप बदलकर आती-जाती रहती थी ।

      उसका पति गोपाल छोटी सी प्राइवेट नौकरी करने लगा। उसकी लड़कियाँ कम उम्र में ही काज, बटन, फाल आदि लगाने में दक्ष हो गईं। बहरहाल पार्वती और गोपाल का परिवार दिन भर की मेहनत मशक्कत के बाद शाम को एक साथ रुखी-सूखी खाकर जब पांच-दस मिनिट भी साथ बैठते तो उन्हें अपना घर किसी हाल में स्वर्ग से कम न लगता।

      इसी बीच हमें जबलपुर में मामी के स्वर्गवास होने का शोक पत्र प्राप्त हुआ । बहुत व्यस्तता के बावजूद मैं अपने उस भाई का परिवार देखने का लोभ न छोड़ सकी जो बचपन में मेरे साथ स्कूल जाता था व मुझे पीटकर रास्ते में खाना खाकर शाम को घर आ जाता था। ये भी सुना था कि उसकी अपाहिज बीबी बड़ी सुशील और मेहनती है मैं उसे देखना व मिलना भी चाहती थी अन्यथा मैं अपने पति को भेज देती सो मैंने स्वयं ही जाना बेहतर समझा मैने फोन से अपनी दो बहनों को भी मामीजी की क्रिया पर पहुँचने को कहा सो वे भी पहुँच गईं।

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      उपरोक्त सभी बातें मुझे वहीं पहुँचकर पता चली। सबसे पहले हमारे पहुँचते ही हमारे कदमों में सिर रख कर पार्वती ने प्रणाम किया उसके बेटे ने भी उसी प्रकार प्रणाम किया। जबकि दूसरे भाइयों ने मात्र घुटनों तक हाथ पहुँचा कर चरण वंदना की औपचारिकता निभा दी थी। जल्दी ही उसने हमारी चाय-पानी की व्यवस्था भी कराई क्योकि हम लोग हजारों मील दूर से गये थे। गरम पानी नहाने के लिये दिया क्योंकि ठंड के दिन थे पार्वती का आंगन के कोने में इस कार्य हेतु चूल्हा जलता ही रहता।

      दूसरे दिन मामी जी का दिन-पानी था सो बहुत से मेहमान आये, गये ।

      बहुतों को हमने पहली बार देखा कोई किसी तरफ से हमारा मामा, भाई, बहन या कुछ भी रिश्तेदार निकल आता। मुझे अच्छा लगा कि मैंने इतनी दूर आकर कोई गलती नहीं की थी अन्यथा इन सब से मैं शायद ही कभी मिल पाती।

      दिन भर के शोर-शराबे के बाद हम सब बहनें कुछ समय पाकर इकट्ठी बैठ गईं। दो मामा की लड़कियाँ, दो मेरी सगी बहनें और भी दूर के रिश्तों की बहनें मेरे साथ बैठ कर हाल सुनाना बताना चाहती थीं। मैंने सब बहनों को इस बात के लिये तैयार किया कि हम सब बहनें पार्वती भाभी व गोपाल भाई के लिये जो बन सके मदद करें सो मेरी एक बहन जो पास के गाँव में रहती थी व संपन्न थी ने एक साइकल गोपाल भैया को गिफ्ट की क्योकि वह अपनी नौकरी हेतु लगभग तीन मील पैदल जाता था, दूसरी बहन ने कमरे में फर्श हेतु तीन हजार रु. देते हुए कहा कि, हमारे भतीजे-भतीजियों के कपड़ों आदि के लिये है क्योंकि उसने भी गोपाल के परिवार व बच्चों को पहली बार देखा था। इसी बीच दिन भर की व्यस्तता के बाद गोपाल मुझसे मिलने आया।

      इतने वर्षों के बाद उसे अचानक देख मैं पहचान ही नहीं पाई क्योंकि वह जवानी में ही बूढ़ा सा लगने लगा था। मेरी जबलपुर वाली बहन बोलते हुए वह मुझ से लिपट गया। इतने वर्षों के सुख-दुख के आँसू झर-झर बहने लगे ना मुझ से कुछ कहते बन रहा था ना मेरे भैया गोपाल से। बचपन में अपने पढ़ न सकने से लेकर जिंदगी के हर भाग में वह मुझसे काफी पीछे छूट गया था जिसका एहसास उसके बहते आँसू करा रहे थे। ना जाने वह क्या कहना सुनना चाहता था और मैं क्या-क्या कहना-सुनना चाहती थी। ना वो कह पा रहा था ना मैं सुन पा रही थी ना मैं कह पा रही थी ना वह सुन पा रहा था। इन सब के बीच सत्य व खास बात ये थी कि भाई-बहन का स्नेह धीरज का बांध तोड़ बहे जा रहा था।

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      मामी के मरने का दुःख तो अलग था पर गोपाल भैया से मिलकर मेरे आनंद का कोई ठिकाना न रहा। वो जो कुछ भी था अपने अपाहिज पर आदरयोग्य परिवार के साथ मेरे सामने था। उसके बच्चे मुझे बहुत प्यारे फूल से सुकोमल पर परिश्रमी व दृढ़ प्रतिज्ञ लगे। मैंने बार-बार बच्चों को दुलार किया। सबके लिये मैं कपड़े खिलौने लेकर गई थी, उन्हें दिये। मेरे पास खर्च के अलावा पाँच हजार रु. मात्र थे सो मैंने गोपाल के बच्चों की पढ़ाई के लिये हैं. कहकर उन्हें दिये अन्यथा पार्वती भाभी व गोपाल भैया को दुख लगता ।

      मेरी रिश्ते की सब बहनों ने भी यथाशक्ति उस परिवार के लिये सुविधा जुटाने के भरसक प्रयास किये जिससे उनका अपनापन व साहस और बढ़ा।

      इन सब बातों के अतिरिक्त एक खास बात ये थी कि सभी ने उन तिरस्कृत लोगों को हम लोगों द्वारा दिया जा रहे मान, प्यार, स्नेह को देखा तो बाकी सबकी भावनायें भी उनके लिये विनम्र और सुखदायिनी बनने लगीं। दूसरे भाई व उनकी पत्नियाँ ये देखकर हैरान थे कि पार्वती भाभी व गोपाल भैया के हाथ कौन सी जादू की छड़ी लग गई है कि हर रिश्तेदार उनकी सहायता करना चाहता है, आदर करना चाहता है, सम्मान देना चाहता है।

      दिन के बाद रात भी आधी से अधिक बीत गई, पता ही नहीं चला। दूसरे दिन सुबह ही हमें लौटना था। इसलिये घंटे दो घंटे को जबरदस्ती सोना पड़ा वर्ना सोने की बिल्कुल इच्छा नहीं थी, लग रहा था मैं अपने बिछुड़े भाई को एक रात में कैसे इतने वर्षों की सब घटनायें सुना दूँ और कैसे उसकी सुन लूँ। जब सबसे पहले वो यूँ ही जबलपुर घूमने आया था वो वहाँ की भाषा में जो कुछ बोलता था हम हँसकर उसे दुबारा वही शब्द बोलने को कहते व हँसते-हँसते लोटपोट होते इतने वर्षों बाद जैसे बचपन लौट आया हो वह मेरी बातें बताकर सबको हँसा रहा था मैं उसकी।

      दूसरे दिन मुझे लौटना था सो सुबह ही पार्वती भाभी ने रास्ते के लिये पराठे-सब्जी बनाकर पैक कर दिया सलाद, अचार व पानी रखना भी वह नहीं भूली थी। ट्रेन में उसका रखा खाना खाते हुए लग रहा था जैसे मुझे छप्पन भोग का आनंद प्राप्त हो रहा हो मुझे अपने भाई के परिवार की गतिविधियों पर गर्व हो रहा था, क्योंकि हजारों संकटों का सामना करते हुए वो जिस जीवट भाव का परिचय दे रहे थे वह आम आदमी के बस की बात न थी। अपाहिज से विवाह की जो गलत छवि मेरे मन में थी, वह धूमिल हो चुकी थी। उसकी जगह पार्वती भाभी का चेहरा दीपशिखा बनकर जगमगा रहा था। मैं सोच रही थी कि किसी ने ठीक ही कहा है –

      खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तदबीर से पहले,
      खुदा बंदे से खुद पूछे बता तेरी रजा क्या है।

      लेखिका
      श्रीमती प्रभा पांडेय जी
      ” पुरनम “

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