।। भिखारी के यहां नौकरी ।।

नमस्कार मित्रों,

प्रीति सिलाई मशीन पर बैठी कपडे काट रही थी। साथ ही बड़बडाये जा रही थी। उफ़ ! ये कैची तो किसी काम की नहीं रही बित्ता भर कपडा काटने में ही उँगलियाँ दुखने लगी हैं।

पता नहीं वो मोहन ग्राइंडिंग वाला कहाँ चला गया। हर महीने आया करता था तो कालोनी भर के लोगों के चाकू कैंची पर धार चढ़ा जाता था, वो भी सिर्फ चंद पैसों में !

मोहन एक ग्राइंडिंग करने वाला यही कोई 20-25 साल का एक युवक था। बहुत ही मेहनती और मृदुभाषी।

चेहरे पे उसके हमेशा पसीने की बूंदें झिलमिलाती रहती लेकिन साथ ही मुस्कुराहट भी खिली रहती।

जब कभी वो कालोनी में आता तो किसी पेड़ के नीचे अपनी विशेष प्रकार की साइकिल को स्टैंड पर खड़ा करता, जिसमे एक पत्थर की ग्राइंडिंग व्हील लगी हुई थी। और सीट पे बैठ के पैडल चला के घुमते हुए पत्थर की व्हील पर रगड़ दे के चाक़ू और कैंचियों की धार तेज कर देता।

इसी बहाने कालोनी की महिलाएं वहाँ इकठ्ठा हो के आपस में बातें किया करती।

जब वो नाचती हुई ग्राइंडिंग व्हील पर कोई चाकू या कैंची रखता तो उससे फुलझड़ी की तरह चिंगारिया निकलती, जिसे शिवम जैसे बच्चे बड़े कौतूहल से देखा करते और आनन्दित भी होते।

फिर वो बड़े ध्यान से उलट पुलट कर चाकू को देखता और संतुष्ट हो के कहता, “लो मेमसाब ! इतनी अच्छी धार रखी है कि बिलकुल नए जैसा हो गया

अगर कोई उसे 10 माँगने पर 5 रूपये ही दे देता तो भी वो बिना कोई प्रतिवाद किये चुपचाप जेब में रख लेता।

प्रीति ने अपने बेटे शिवम को आवाज लगाई। “शिवम जा के पड़ोस वाली मीनू बुआ से कैची तो मांग लाना जरा” ! पता नहीं ये मोहन कितने दिन बाद कॉलोनी में आएगा।

थोड़ी देर बाद जब शिवम पड़ोस के घर से कैंची ले के लौटा तो उसने बताया कि उसने मोहन को अभी कॉलोनी में आया हुआ देखा है।

प्रीति बिना समय गवाँये जल्दी से अपने बेकार पड़े सब्जी काटने वाले चाकुओं और कैंची को इकठ्ठा किया और बाहर निकल पड़ी।

बाहर जाके प्रीति ने जो देखा वो मुझे आश्चर्य से भर देने वाला दृश्य था !!

प्रीति ने देखा कि मोहन अपनी ग्राइंडिंग वाली साइकिल के बजाय एक अपाहिज भिखारी की छोटी सी लकड़ी की ठेला गाडी को धकेल के ला रहा है, और उस पर बैठा हुआ भिखारी “भगवान के नाम पे कुछ दे दे बाबा !” की आवाज लगाता जा रहा है।

उसके आगे पैसों से भरा हुआ कटोरा रखा हुआ है। और लोग उसमे पैसे डाल देते थे।

पास आने पर प्रीति बड़ी उत्सुकता से मोहन से पूछा, “मोहन ये क्या ?
और तुम्हारी वो ग्राइंडिंग वाली साइकिल ??

मोहन ने थोड़ा पास आके धीमे से फुसफुसाते हुए स्वर में कहा, “मेमसाब ! सारे दिन चाकू कैंची तेज करके मुझे मुश्किल से सत्तर अस्सी रुपये मिलते थे।

जब कि ये भिखारी अपना ठेला खींचने का ही मुझे डेढ़ सौ दे देता है ! इसलिए मैंने अपना पुराना वाला काम बंद कर दिया।

प्रीति हैरत से मोहन को दूर तक भिखारी की ठेला गाडी ले जाते देखती रही ! !!

और सोचती रही, एक अच्छा भला इंसान जो कल तक किसी सृजनात्मक कार्य से जुड़ा हुआ समाज को अपना योगदान दे रहा था आज हमारी ही सामाजिक व्यवस्था द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया!

हम अनायास एक भिखारी को तो उसकी आवश्यकता से अधिक पैसे दे डालते हैं, लेकिन एक मेहनतकश इन्सान को उसके श्रम का वह यथोचित मूल्य भी देने में संकोच करने लगते हैं !

उससे मोल भाव करते हैं। यदि हम हुनरमंद और मेहनतकशों को उनके श्रम का सही मूल्य चुकाएँ तो समाज में उसके श्रम की उपयोगिता बनी रहे। उसकी खुद्दारी और हमारी मानवता दोनों शर्मिंदा होने से बच जाएँ यह हम सबके लिए विचारणीय प्रश्न है!

लेख पढ़ने के लिए धन्यवाद मित्रों.

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